भारतीय मूल का पहला प्रधानमंत्री मिलने से पहले ही UK ने भारत-केन्द्रित नीतियां बनाना शुरू कर दिया है

UK की विदेश नीति में भारत को मिला प्रथम स्थान!

ब्रेक्जिट युग के बाद बदलते दौर में यूके भारत के साथ अपनी नीतियों में भी बदलाव कर रहा है। भारत के प्रति ब्रिटेन का रुख बहुत तेजी के साथ नर्म पड़ रहा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के जाने के बाद संभावनाएं जताई जा रही हैं कि वर्तमान वित्त मंत्री और भारतीय ब्रिटिश नागरिक ऋषि सुनक ब्रिटेन के अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं। ये कदम भारत और ब्रिटेन के बीच बेहद मजबूत रिश्तों का पर्याय बन सकता है लेकिन उससे पहले ब्रिटेन के अन्य कदम संकेत दे रहे हैं कि सुनक के आने से पहले ही वो भारत के साथ रिश्तों की नई नीतियां बना रहा है।

दरअसल, एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन और भारत के बीच एक रक्षा रसद का सौदा अब अपने अंतिम चरण में है जिसे दोनों के बीच रिश्तों के एक नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा लॉजिस्टिक का ये सौदा बोरिस जॉनसन के भारत के प्रति बदलते रवैए औऱ नीतियों को दर्शाता है। गौरतलब है कि ब्रेक्जिट युग के बाद अब ब्रिटेन अपनी रक्षा से लेकर विदेश नीतियों को अंतिम रूप देने में लगा हुआ है।

इस मामले को लेकर भारत में कार्यरत ब्रिटेन के राजदूत जॉन थॉमसन ने कहा था कि भारत Integrated Review में एक मजबूत मित्र देश के रूप में सामने आया है और उनका ये बयान इस ओर साफ इशारा करता है कि भारत और ब्रिटेन के बीच के कूटनीतिक रिश्ते काफी प्रगाढ़ होते जा रहे हैं औऱ ये दोनों एक दूसरे के हितों का ख्याल रखते हुए अपनी नीतियां बना रहे हैं।

ब्रेक्जिट के बाद से ब्रिटेन भारत को नजर अंदाज नहीं कर सकता और उसके लिए इंडो-पैसेफिक क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। यूके इस बात को अच्छे से समझता है कि उसे यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के बाद एक अच्छे विकल्प की आवश्यकता होगी ब्रेक्जिट के बाद वो अपने वाणिज्यिक और व्यापारिक हित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करेगा। ऑस्ट्रेलिया भारत, न्यूजीलैंड, वियतनाम औऱ जापान के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए काम करना चाहता हैं क्योंकि ये क्षेत्र ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यूके भारत को इसलिए भी नजरंदाज नहीं कर सकता है क्योंकि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के मध्य में आता है और भौगोलिक रूप से स्ट्रेट ऑफ मलक्का को नियंत्रित करता है जोकि भारतीय और प्रशांत महासागरों के बीच मुख्य शिपिंग चैनल। इसलिए इस क्षेत्र में व्यापार की दृष्टि से भारत का महत्व और बढ़ जाता है।

ब्रिटेन मुख्य रूप से इंडो-पैसेफिक में केवल व्यापारिक नीति से आना चाहता हैं, लेकिन बदलती भू-राजनीति इस तरह की है कि इंडो-पैसिफिक में वाणिज्यिक हित सुरक्षा हितों के साथ चलते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन भारत के साथ मिलकर रक्षा लॉजिस्टिक समझौता कर रहा है, जो रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यूके हाल के समय में भारत के साथ अपने व्यापरिक रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है जोकि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के लिए भी बढ़ाएगा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रक्षा औऱ रसद से जुड़ी डील बिल्कुल अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है जिसके सफल होने की संभावना भी जताई जा रही है।

इस मामले में स्कूल ऑफ ओरिएंटल और अफ्रीकन स्टडीज के एक विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने बताया, “भारत और ब्रिटेन के बीच ये लॉजिस्टिक्स डील बेहद महत्वपूर्ण है इस तरह के समझौते केवल सैन्य रणनीतिक मूल्य से ही नहीं, बल्कि चीन औऱ पाकिस्तान के साथ विदेश नीति के बदलावों में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।” उन्होंने ये भी कहा, “लंबे समय तक ब्रिटेन ने अमेरिका-चीन और भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों में संतुलन को लेकर अहम भूमिका निभाई है। वहीं ये लॉजिस्टिक डील इस बात की ओर भी इशारा कर रही है कि यूके अब चीन के साथ रिश्तों को लेकर काफी सावधान हो चुका है।”

वास्तव में भारत और ब्रिटेन के बीच ये रक्षा रसद संधि चीन के लिए एक संकेत भी है। लंदन नई दिल्ली को आश्वस्त कर रहा है कि वह अब चीन या अन्य के लिए भारत और अमेरिका के साथ अपने संबंधों पर कोई आंच नहीं आने देगा। इसके अलावा यूके भारत और पाकिस्तान के बीच अपने संबंधों को संतुलित करने की भी कोशिश नहीं करेगा। उसने भारत के दोनों प्रतिद्वंदियों पाकिस्तान और चीन को नजरंदाज करके भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने की नीति अपनाई है। भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्तों को लेकर ये कहा जा सकता है कि विश्वास बढ़ने के साथ ही ये रिश्ता औऱ अधिक गहरा होगा औऱ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में दोनों के कूटनीति और व्यापारिक रिश्तों में और अधिक मजबूती आएगी और दोनों के लिए ये एक फायदेमंद सौदा होगा।

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