लद्दाख में Indian Army ने चीनियों को पीछे धकेला, रूस में जयशंकर ने चीनी मंत्री को धूल चटा दी

Indian Army और एस जयशंकर- दोनों अपने काम में माहिर हैं

जब से पूर्वी लद्दाख में भारत ने चीन को चकमा देते हुए बढ़त हासिल किया है, तब से बीजिंग इस तनावपूर्ण गतिरोध से बाहर निकलने का रास्ता खोजने की कोशिश कर रहा है। कभी रक्षा मंत्री की बैठक बुला कर तो कभी विदेश मंत्री की बैठक बुला कर।इसी क्रम में गुरुवार को मास्को में भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर की बैठक चीनी समकक्ष Wang Yi के साथ हुई। इस बैठक में भी भारत ही हावी रहा। एक तरफ भारत ने ज़ोर दे कर कहा कि यथास्थिति बहाल की जानी चाहिए और चीनी PLA को आक्रामकता बंद करनी चाहिए, वहीं चीन भी भारत को दोष देने से बचता दिखाई दिया।

भारत और चीन दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में चल रही सीमा विवादों को समाप्त करने के लिए पांच-बिंदु सर्वसम्मति जारी करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया जिसमें स्पष्ट रूप से Wang Yi डॉ जयशंकर के सामने घुटने टेकते दिखाई दिए। संयुक्त बयान में दोनों विदेश मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि सीमावर्ती क्षेत्रों में मौजूदा स्थिति किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। इसलिए, उन्होंने सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों के सीमा सैनिकों को अपनी बातचीत जारी रखना चाहिए और मामले को जल्द ही सुलझाना चाहिए।

यही नहीं, चीन ने उस संयुक्त बयान के अलावा एक और अलग बयान जारी किया जिसमें भारत के साथ किसी भी हालात में विवाद को न बढ़ाने से बचने और शांति की बात की गयी है। खास बात यह है कि उस बयान में चल रहे विवाद के लिए भारत को जिम्मेदार नहीं बताया गया है। यह हैरान करने वाली बात है क्योंकि अभी तक हर बार चीन आधिकारिक रूप से भारत को ही विवाद के लिए जिम्मेदार ठहरता आया था लेकिन इस बार आश्चर्यजनक रूप से चीन के रुख में बदलाव देखने को मिला।

चीनी विदेश मंत्रालय ने अपने अलग बयान में, राजनयिक और सैन्य बातचीत के माध्यमों को खुले में रखते हुए और सीमा के समीपवर्ती क्षेत्रों में “शांति बहाल करने” के लिए प्रतिबद्ध होने के साथ भारत के साथ संचार बनाए रखने की बात कही है।

चीन के इस कदम से यह कहना गलत नहीं होगा कि पूर्वी लद्दाख सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बढ़े तनाव के कारण अब बीजिंग सतर्कता से आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि मास्को में दोनों देश के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान के बाद भी चीन ने एक अलग बयान जारी किया।

Wang Yi ने खुद इस बात पर जोर दिया है कि “यह आवश्यक है कि तुरंत उकसावे जैसे गोलीबारी और अन्य खतरनाक हरकतों को बंद किया जाए जो दोनों पक्षों द्वारा की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करती है।”

हालांकि,एक तरह चीन के विदेश मंत्री इस तरह से शांति की बात कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ CCP की मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स चीन को युद्ध की तैयारी करने का सलाह दे रहा है। ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक लेख में कहा कि, “अगर कूटनीतिक बातचीत विफल होती है तो चीनी पक्ष को पूरी तरह से सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और इसके सीमावर्ती सैनिकों को आपात स्थिति का जवाब देने में सक्षम होना चाहिए तथा किसी भी समय युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।”

यह लेख मॉस्को में विदेश मंत्री जयशंकर और चीनी समकक्ष वांग यी की बैठक से ठीक पहले ही प्रकाशित किया गया था। CCP के मुखपत्र ने भारत पर वर्ष 1962 के संघर्ष में मिली हार का द्वेष रखने का भी आरोप लगाया था और भारत को घमंड से भरा हुआ बताया।

हालाँकि, CCP द्वारा संचालित मीडिया युद्ध की घोषणा कर रही है, लेकिन शी जिनपिंग प्रशासन वास्तव में भारत के साथ किसी भी युद्ध से बचते हुए दिखाई दे रहे है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) आज भी उसी सदमे में है जब पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना को Pangong Tso झील के उत्तरी और दक्षिणी तट पर धकेल कर उच्चाई हासिल किया था।

इसके अलावा, बॉर्डर विवाद के कारण भारत लगातार चीनी कंपनियों को एक के बाद एक झटके दे चुका है। इस कारण चीनी को भारत की कार्रवाइयों से बड़ा वित्तीय झटका लगा है। चीन को यह पता है कि हिमालय में PLA की हरकत चीनी अर्थव्यवस्था को केवल नुकसान पहुंचा रही है और जब तक बॉर्डर विवाद चलेगा तब तक उसकी निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को भारत इसी प्रकार झटके देता रहेगा।

भारतीय सशस्त्र बलों ने PLA की स्थिति को देखते हुए लद्दाख में ऊंचाइयों पर है और चीनी सैनिकों के किसी भी हरकत का जवाब बेहद दोगुने ताकत के साथ मिलेगा इसलिए चीन बैकफुट पर जाने को मजबूर है।

अब चीन किसी भी कूटनीतिक बातचीत में भारत को दोष देने की स्थिति में नहीं है और न ही वह भारत के खिलाफ बॉर्डर पर एक्शन लेने की स्थिति में है। यही कारण है कि अब चीन ने एस जयशंकर के सामने आधिकारिक रूप से घुटने टेक कर किसी भी तरह से चल रहे सैन्य गतिरोध को समाप्त करना चाहता है।

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