‘हम देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते थे’, दिल्ली दंगों के आरोपी जामिया के छात्र का कबूलनामा हमने ही बसों में आग लगाकर हिंसा को और भड़काया था

सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के पारित होने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया इलाके में छात्रों द्वारा निकले गए मार्च के दौरान बसें जलाए जाने की तस्वीर हम सभी को बेहतर तरीके से याद होगी। वही हिंसक घटना जिसके बाद दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने अफवाह फैलाते हुए दिल्ली पुलिस को घेरा था। उस समय हुई हिंसक घटना में जामिया प्रशासन ने अपने छात्रों का हाथ होने की बात से साफ़ इंकार किया था और कहा था कि इस शांतिपूर्ण मार्च को कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा हाईजैक कर लिया गया था, जिससे हिंसा हुई।

मई महीने में दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया के एक छात्र, आसिफ इक़बाल, को उसी हिंसक घटना को अंजाम देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। अब आसिफ इक़बाल ने अगस्त में पुलिस के सामने माना है कि न सिर्फ दिसंबर महीने में जामिया में हुई हिंसा में जामिया के छात्रों का हाथ था बल्कि इनके पूरे नेक्सस ने जामिया हिंसा के बाद दिल्ली दंगों की योजना बनाई और उसे अंजाम दिया।

आसिफ, जो कि जामिया मिलिया इस्लामिया में BA तृतीय वर्ष का छात्र है और फ़ारसी विषय की पढ़ाई करता है, ने बताया की 12 दिसम्बर को उसने जामिया इलाके में करीब 2500 से 3000 लोगों को जुटाकर मार्च निकाला। इसी मार्च के दौरान शरजील इमाम ने चक्का जाम करने वाला भड़काऊ भाषण दिया था। आसिफ ने माना है कि रैली के दौरान लोगों को हिंसा करने के लिए भड़काया गया था। यही नहीं, उसने बताया है कि मार्च का नाम “गांधी पीस मार्च” रखा गया था, जिससे ये सभी को स्वीकार्य हो जाए। उसने बताया है कि इस “गांधी पीस मार्च” के दौरान उसने ही बसों में आग लगाईं थी, उसके इन आंदोलनों का अंतिम ध्येय भारत को इस्लामिक राष्ट्र के रूप में बनाना था।

उसने बताया की जामिया में हुई हिंसा के बाद जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी का गठन हुआ था, जिसमें वामपंथी छात्र संगठन AISA, कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI, स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) के अतिरिक्त JSF, MSF आदि कई संगठनों के सदस्य शामिल थे।

उसने बताया कि आंदोलन और हिंसा के लिए PFI और जामिया के पूर्व छात्रों के संगठन एलुमनाइ असोसिएशन ऑफ़ जामिया मिलिया इस्लामिया (AAJMI ) ने धन मुहैय्या करवाया। AAJMI में वे सभी लोग शमिल हैं, जो जामिया से पढ़ें हैं और देश में प्रतिष्ठित नौकरियां कर रहे हैं। यद्यपि AAJMI के कौन-कौन से सदस्य इसमें शामिल हैं, इसकी जानकारी नहीं है लेकिन यह गंभीर चिंता का विषय है कि ऐसे लोग जो देश में सफेदपोश नौकरियों में लगे हैं, और जिनका समाज में प्रभाव है, वे सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं. यह बताता है कि इस्लामिक कट्टरपंथी समाज में कितने भीतर तक अपनी पहुँच रखते हैं।

आसिफ ने बताया की उसके भड़काऊ भाषणों के प्रभाव के कारण उसे सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी मुसलमानों को विरोध के लिए उकसाने हेतु भेजा गया। SIO के लोगों ने उसे लखनऊ, कानपुर, उज्जैन, इंदौर, मंगलौर,कोटा, पटना आदि जगहों पर भेजा। यह बताता है कि इस आंदोलन के नाम पर हिंसा की साजिश सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। वास्तव में इसकी योजना देशव्यापी दंगों की थी। ऐसा ही बयान दंगों की एक अन्य आरोपी गुलफिशा उर्फ गुल ने भी दिया था। उसने बताया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने उसे कहा था कि उनकी योजना पूरे देश में मोदी सरकार के खिलाफ विद्रोह करवाने की है, जिससे सरकार घुटनों पर आ जाए।

गुलफिशा और आसिफ के दिए बयान में और भी कई समानता है, जैसे दोनों ने उमर खालिद का नाम दंगों की साजिश से जोड़ा है। आसिफ ने यह बताया है कि उमर खालिद ने राष्ट्रपति ट्रम्प के फरवरी में हुए भारत दौरे के समय चक्का जाम करने की बात की थी। जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ रही है,खालिद की संलिप्तता साफ़ जाहिर हो रही है।

इतना ही नहीं, गुल ने भी जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी का नाम लिया था। उसके पूर्व शिवविहार इलाके में हुई हिंसा में भी PFI JCC उमर खालिद आदि का नाम आया था। ताहिर के बयान में भी उसने कबूल किया था कि कैसे उसने कबाड़ियों से दुगने दाम पर बोतलें खरीदीं, जिसका इस्तेमाल पेट्रोल बम बनाने में किया गया। उसने भी कबूल किया था कि वह हिंदुओं को सबक सीखना चाहता था।

साफ़ जाहिर है कि, यह पूरा आंदोलन, इसके दौरान हुई हिंसा और दिल्ली दंगें सभी योजनाबद्ध थे। इसमें संलिप्त लोगों की मंशा भारत सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराने और देश में सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह जैसा माहौल बनाने की थी। इनका उद्देश्य था कि पूरे देश में आग लगा दी जाए, जिससे सरकार को इनकी बात माननी पड़े। यदि सरकार किसी भी प्रकार का बल प्रयोग करे तो उसे अपनी समर्थन में खड़े मीडिया के एक सशक्त धड़े के माध्यम से वैश्विक स्तर पर बदनाम किया जाए। दिल्ली दंगों के दौरान 53 लोग मारे गए, लेकिन जैसे-जैसे पूरी साजिश सामने आ रही है, ऐसा लग रहा है कि यदि ये संगठन अपनी कोशिशों में पूरी तरह से कामयाब होते तो मरने वालों का आंकड़ा इससे कई गुना अधिक होता।

Comments