महाराष्ट्र में बड़ी लापरवाही / कोरोना पॉजिटिव मां का 11 दिन तक इलाज नहीं किया, दादी 9 दिनों तक हॉस्पिटल के बाथरूम में पड़ी रहीं, वहीं से लाश मिली

30 मई की रात मां बाथरूम गईं तो वहीं गिर गईं, दो घंटे तक बाथरूम में बेहोश पड़ी रहीं, होश आने पर खुद ही उठकर अपने बेड पर पहुंचीं
2 जून को अस्पताल से फोन आया की दादी बेड पर नहीं हैं, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की, 10 मई को बोले- बाथरूम में दादी की लाश मिली है

नईदिल्ली. देश में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है महाराष्ट्र। वहीं के जलगांव जिले में एक परिवार के दो सदस्यों की मौत कोरोना से हुई है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है। मौत की वजह कोरोना से ज्यादा अस्पताल की लापरवाही है। जिन दो सदस्यों की यहां बात हो रही है वह हर्षल नेहटे की मां और दादी हैं।

हर्षल के ही शब्दों में उनकी पूरी बात-


हर्षल नेहटे पिछले आठ सालों से अपनी पत्नी के साथ पुणे में रहते हैं। वह एक निजी कंपनी में नौकरी करते हैं।

मैं पुणे में पत्नी के साथ रहता हूं। पत्नी नौ माह की गर्भवती है। पापा, मम्मी और दादी भुसावल में रहते थे। पापा दो साल पहले ही रेलवे से रिटायर हुए हैं। वो रेलवे में ड्राइवर थे। रिटायर होने के बाद इटारसी से भुसावल आ गए। कोरोनावायरस ने सिर्फ 20 दिनों में मेरे पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि जो मां और दादी 10 दिन पहले तक मुझसे बात कर रहीं थीं, वो अब इस दुनिया से जा चुकी हैं।

18 मई को पापा को बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हुई। उन्होंने मुझे फोन करके बताया तो मैंने उन्हें हॉस्पिटल में दिखाने को कहा। उस दिन भुसावल का कोई हॉस्पिटल खुला नहीं था तो पापा जलगांव के निजी अस्पताल में चले गए।
उन्होंने पापा का सिटी स्कैन किया। रिपोर्ट कुछ गड़बड़ समझ आई तो डॉक्टर ने कहा कि आप सिविल हॉस्पिटल में कोरोना टेस्ट कराइए। पापा का टेस्ट हुआ 20 मई को पता चला कि उन्हें कोरोना संक्रमण हुआ है।

इसके बाद प्रशासन की टीम मेरे घर पहुंची और मम्मी-दादी को भुसावल में ही एक स्कूल में बनाए गए क्वारैंटाइन सेंटर में ले गई। वहां जाकर उन दोनों का कोरोना टेस्ट हुआ। 22 मई को वो दोनों भी पॉजिटिव आए। लेकिन 27 मई तक इलाज शुरू नहीं हुआ। क्वारैंटाइन सेंटर में कहा गया कि कोई लक्षण दिखेंगे तो अस्पताल भेजेंगे। अभी यहीं आराम करो।

28 को दादी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो फिर दोनों को क्वारैंटाइन सेंटर से रेलवे हॉस्पिटल में एडमिट कर दिया गया। यहां आने के तीन दिन बाद तक भी कोई ट्रीटमेंट शुरू ही नहीं हुआ। मेरी मां की उम्र 60 साल थी और दादी की 80 साल।

हर्षल की मां तिला नेहटे 60 साल की थीं और पूरी तरह स्वस्थ्य थीं। हॉस्पिटल की लापरवाही ने उनकी जान ले ली।

30 मई की रात मां बाथरूम गईं तो वहीं गिर गईं। दो घंटे तक बाथरूम में बेहोश पड़ी रहीं। लेकिन किसी को पता ही नहीं चला। फिर होश आने पर खुद ही उठकर अपने बेड पर पहुंचीं। उन्होंने फोन पर मुझे ये बात बताई।

31 मई को मैं मम्मी को लगातार फोन कर रहा था लेकिन वो फोन ही नहीं उठा रहीं थीं तो मुझे चिंता हुई। फिर मैंने हॉस्पिटल में फोन करके बताया कि कल वो बाथरूम में गिर गई थीं और अभी फोन नहीं उठा रही हैं।

इसके बाद हॉस्पिटल स्टाफ ने खोजबीन की तो वो फिर बाथरूम में ही गिरी पड़ी मिलीं। उन्हें व्हीलचेयर पर बिठाकर बेड तक छोड़ दिया गया। उनकी हालत बहुत खराब थी तो स्टाफ ने डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर आए तो बोले कि, बहुत सीरियस हैं इसलिए इन्हें सिविल अस्पताल में रेफर कर रहे हैं। वहां स्टाफ उन्हें लेकर गया तो पता चला कि एक भी आईसीयू बेड खाली नहीं है। उन्हें आईसीयू वॉर्ड के बाहर ही लिटा दिया गया।

रात डेढ़ बजे उनकी मौत हो गई। मुझे पता ही नहीं था। लेकिन अगले दिन जब पुलिस हमारे भुसावल वाले घर पहुंची तो उन्होंने ये बात पड़ोसियों को बताई। इसके बाद पड़ोसियों ने मुझे फोन करके बताया। हॉस्पिटल स्टाफ ने ही मां का अंतिम संस्कार कर दिया।

मम्मी 60 साल की थीं बावजूद इसके दो-दो घंटे योगा करती थीं। उन्हें कोई खास दिक्कत भी नहीं थी लेकिन एडमिट होने के बाद 11 दिन बाद तक भी उनका इलाज ही शुरू नहीं हो पाया था शायद इसी वजह से उनकी मौत हो गई।

1 जून को मैंने सिविल अस्पताल में फोन करके दादी के बारे में पूछा तो पता चला कि उनकी हालत भी सीरियस है। डॉक्टर बोले, उन्हें कोरोना संदिग्ध वॉर्ड में रखा है। मैंने कहा लेकिन वो तो कोरोना पॉजिटिव हैं, फिर उन्हें कोरोना संदिग्ध वॉर्ड में क्यों रखा है, तो जवाब मिला कि भुसावल से जो रिपोर्ट आई थी उसमें यह स्पष्ट नहीं था कि वो पॉजिटिव हैं या नहीं। मेरे बात करने के तुरंत बाद दादी को कोरोना वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया।


हर्षल ने बताया कि उनकी दादी और मम्मी कोरोना पॉजिटिव थीं, फिर भी एक हफ्ते तक तो इलाज शुरू ही नहीं हुआ।

2 जून को बात हुई तो डॉक्टर ने बताया कि आपका पेशेंट तो बेड पर है ही नहीं। दिनभर भी दादी का कहीं पता नहीं चला। फिर उन्होंने रात में 8 बजे पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। हम लोग रातभर सोचते रहे कि दादी कहां होंगी लेकिन फोन लगाने के अलावा कुछ और कर नहीं सकते थे, क्योंकि मैं अपनी प्रेग्नेंट पत्नी के साथ पुणे में था।

3 जून को डॉक्टर को फोन लगाया तो उन्होंने बताया कि दादी मिल गई हैं और उन्हें सात से नौ नंबर वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया। 4 जून को हमें फोन पर कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला। 5 जून की शाम को बात हुई तो पता चला कि दादी तो मिली ही नहीं। डॉक्टर ने किसी कंफ्यूजन में मिल गईं ये कहा था। फिर मैंने लोकल पुलिस में मिसिंग रिपोर्ट दर्ज करवाई। हालांकि पुलिस ने भी कुछ नहीं किया, 10 जून तक दादी कहीं मिली ही नहीं। 10 जून को सुबह साढ़े दस बजे मेरे पास हॉस्पिटल से फोन आया। उन्होंने बताया कि आपकी दादी मिल गई हैं, लेकिन अब वो जिंदा नहीं रहीं। उन्होंने बताया कि, वो हॉस्पिटल के वॉशरूम में ही थीं लेकिन कोई वहां गया नहीं तो पता नहीं चला। जब बदबू आई तब सफाईकर्मियों ने गेट खोला तो दादी की बॉडी वहां से मिली

इतना होने पर मीडिया जमा हो गई थी। पुलिस पहुंच गई थी। इसलिए अंतिम संस्कार फटाफट प्रशासन द्वारा कर दिया गया। मेरे परिवार का कोई भी सदस्य न आखिरी बार मां को देख सके न दादी को। पापा की 1 जून को रिपोर्ट निगेटिव आई। वो नासिक में दीदी के घर पर हैं। अब पूरी तरह से टूट चुके हैं। रिटायर होने के बाद मां के साथ वक्त बिताना चाहते थे। उन्हें घुमाना-फिराना चाहते थे लेकिन सब सपने पलभर में बिखर गए।


बाथरूम में बॉडी मिलने के बाद पुलिस और अधिकारियों का जमावड़ा लग गया था। मीडिया भी इकट्‌ठा हो गई थी।
मेरी पत्नी नौ माह की गर्भवती है। यदि में जलगांव जाता तो यहां कभी भी डिलीवरी की नौबत आ सकती थी। अब यही कहना चाहता हूं कि मेरा परिवार तो बर्बाद हो गया लेकिन जिन लोगों ने लापरवाही की उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए। इस मामले में डीन डॉक्टर बीएस खैरे सहित पांच अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है।

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