‘नो मुस्लिम स्टाफ’- चेन्नई में जैन बेकरी के मालिक पर FIR, जबकि हलाल पर चुप्पी साध ली जाती है

हलाल को लेकर लिखा जाता है कि गैर-मुस्लिम तो सही, पर जैन ने लिख दिया तो क्या गलत था?

ऐसा लगता है कि भारत में सेक्युलरिजम के नाम पर अब्राहमिक धर्मों को छोड़ कर सभी के धार्मिक अधिकार छिन लिए गए हैं। हिन्दू अपने दुकान का नाम हिन्दू नहीं रख सकता है और अपने शाकाहारी भोजन के लिए जाने जाने वाले जैन अपने खाने की दुकान में अपने मन का स्टाफ नहीं नियुक्त कर सकता है। हलाल सामान हर दुकान पर मिलना चाहिए लेकिन, कोई हिन्दू अपने दुकान में भगवा झंडा नहीं लगा सकता। जी हाँ!!

भारत ही एक ऐसा देश है जहां सेक्युलरिज्म के नाम पर वह सब किया जाता है जो हिंदुओं या उससे जुड़े धर्मों को नीचा दिखाये। चेन्नई में फिर से यही देखने को मिला है।

दरअसल, चेन्नई की मशहूर जैन बेकरी एंड कन्फेक्शनरी इस विवाद के केंद्र में है। पारसनाथ के इस बेकरी ने एक विज्ञापन छपवाया जिसमे लिखा गया था कि ‘बेकरी का सामान जैन लोगों ने बनाया है…कोई मुस्लिम स्टाफ नहीं है।’ प्रशांत ने ही इस विज्ञापन को Whats app ग्रुप पर शेयर किया था जिसके बाद यह विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हुआ था।

इसके बाद तो सेक्युलरों की फौज खड़ी हो गयी और रोना-धोना मचाने लगे। यह सभी को पता है कि जैन अपने शाकाहारी खाने को लेकर कितने अनुशासित होते हैं। लेकिन फिर भी पुलिस ने जैन बेकरी एंड कन्फेक्शनरी के मालिक को धारा 295A (जानबूझकर किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करना) के तहत गिरफ्तार किया है। यही नहीं इसके अलावा दुकान के मालिक पर आईपीसी की धारा 153 (दंगा भड़काने के लिए उकसाना), 153 ए और 505 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि आखिर पुलिस कैसे इस निर्णय पर पहुंची कि इस विज्ञापन से दंगे हो सकते हैं? चेन्नई पुलिस ने पहले ही ये निर्णय ले लिए कि एक विशेष वर्ग इससे आहत हो जाएगा।

यहां सवाल एक विज्ञापन का नहीं बल्कि एक वर्ग का है जिसके डर से पुलिस ने जैन बेकरी पर आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया। यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पुलिस ने IPC की 153A लगाया है जिसका अक्सर इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने के लिए किया जाता है और किसी भी निर्दोष पर मढ़ दिया जाता है। बता दें कि आईपीसी की धारा 153 (ए) उन लोगों पर लगाई जाती है, जो धर्म, भाषा, नस्ल वगैरह के आधार पर लोगों में नफरत फैलाने की कोशिश करते हैं।

यहाँ पर केवल लिखने के लिए कि उसके बेकरी में कोई भी मुसलमान काम पर नहीं रखा जाता है, जैन बेकरी के मालिक को कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है?

जिस तरह से जैन अपने भोजन में विशेष शाकाहार के लिए हमेशा सजग रहते हैं उसमें यह बताने में कोई बुराई नहीं है कि यह बेकरी केवल शाकाहारी कर्मचारियों को नियुक्त करती है। इसके अलावा, जो मामला जैन बेकरी पर दर्ज किया गया है वो मुसलमानों के खिलाफ क्यों नहीं की जाती है? पुलिस यहाँ पर मौन क्यों हो जाती है? मुस्लिम स्पष्ट रूप से केवल हलाल प्रमाणित उत्पादों का उपभोग करते हैं, जिसका अर्थ है कि ऐसे उत्पादों का निर्माण केवल मुसलमानों द्वारा ही नियोजित किया जाता है। पुलिस को ऐसे किसी भी मामले में किसी प्रकार का एक्शन लेने में साँप क्यों सूंघ जाता है?

हलाल प्रमाणित उत्पाद तो गैर मुस्लिमों को जबरन खिलाया जाता है लेकिन जब एक जैन ने अपनी धार्मिकता का पालन करने की कोशिश की तब उसे बुक कर गिरफ्तार कर लिया गया। आखिर इस सेक्युलरिजम में सभी धर्मों के लिए एक ही मानदंड क्यों नहीं है?

यह सिर्फ चेन्नई की बात नहीं है बल्कि, पूरे देश में यही देखने को मिल रहा है। कुछ ही दिनों पहले झारखंड में पुलिस ने एक हिंदू फल विक्रेता को अपने स्टॉल के बैनर पर हिन्दू लिखने के लिए परेशान किया था। उस दुकानदार ने बस इतना ही लिखा था कि विश्व हिंदू परिषद द्वारा अनुमोदित हिंदू फल की दुकान। फिर क्या झारखंड सरकार की पुलिस ने तुरंत अपना रूप दिखते हुए कई आरोप लगा कर उस दुकान से बैनर हटवा दिया। यही नहीं नालंदा में तो भगवा झण्डा लगाने के लिए IPC के 147, 149 188 153ए और 295ए धाराएँ लगा दी गयी थी।

अब तो ऐसा लगता है अपने ही देश में गैर मुस्लिमों को इसी देश के कानून की धाराओं से अपने धर्म का, विश्वास का, आस्था का, श्रद्धा का पालन करने से रोका जा रहा है। एक ओर जहां संविधान धार्मिक आस्था की स्वतन्त्रता देता है तो वहीं चन्नई, झारखंड और नालंदा जैसी घटनाए हमें यह याद दिलाती हैं कि आपको ऐसा करने की आजादी नहीं है।


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